सार ●कक्षा 12 ●अध्याय 3

 मानव विकास अध्याय का सार

वर्तमान संदर्भ में कम्प्यूटरीकरण, औद्योगीकरण, सक्षम परिवहन और संचार जाल, बृहत् शिक्षा प्रणाली, उन्नत और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, वैयक्तिक सुरक्षा इत्यादि को विकास का प्रतीक समझा जाता है।
भारत जैसे उत्तर उपनिवेशी देश के लिए उपनिवेशवाद, सीमांतीकरण, सामाजिक भेदभाव और प्रादेशिक असमता इत्यादि विकास का दूसरा चेहरा दर्शाते हैं।
विकास को विवेचनात्मक ढंग से देखने के लिए सर्वाधिक व्यवस्थित प्रयास 1990 ई. में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रथम मानव विकास रिपोर्ट का प्रकाशन है। तब से यह संस्था प्रतिवर्ष विश्व मानव विकास रिपोर्ट को प्रकाशित करती आ रही है।
1993 ई. की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार- प्रगामी लोकतंत्रीकरण और बढ़ता लोक सशक्तिकरण मानव विकास की न्यूनतम दशाएं हैं।
भारत मानव विकास सूचकांक के संदर्भ में विश्व के 188 देशों में 131 वें स्थान पर है। एचडीआई के संयुक्त मूल्य 0.624 के साथ भारत मध्यम मानव विकास दर्शाने वाले देशों की श्रेणी में आता है। इस सूची में पहला स्थान नॉर्वे का है। (यूएनडीपी 2016)
भारत के योजना आयोग ने भी देश के लिए मानव विकास रिपोर्ट आर्थिक उपलब्धि, सामाजिक सशक्तिकरण, सामाजिक वितरण न्याय, अधिगम्यता, स्वास्थ्य और राज्यों द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कल्याणकारी उपायों को शामिल करते हुए मानव विकास रिपोर्ट तैयार की है।
विगत वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय और उपभोग व्यय में वृद्धि हुई है, जिसके कारण गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली जनसंख्या के अनुपात में लगातार गिरावट आई है। वर्ष 2011-12 में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में 26% शहरी क्षेत्रों में 14% और पूरे देश में 22% के रूप में अनुमानित किया गया था।
स्वस्थ मस्तिष्क स्वस्थ शरीर में निवास करता है और एक स्वस्थ शरीर के लिए स्वच्छ वातावरण विशेष रूप से स्वच्छ हवा, पानी, शोर मुक्त माहौल और स्वच्छ परिवेश प्राथमिक आवश्यकताएं होती हैं।
नव माल्थसवादियों, पर्यावरणविदों और आमूलवादी पारिस्थितिकविदों का मानना का मानना है कि एक प्रसन्नचित्त एवं शांत सामाजिक जीवन के लिए जनसंख्या और संसाधनों के बीच उचित संतुलन होना चाहिए।
सर रॉबर्ट माल्थस मानव जनसंख्या की तुलना में संसाधनों के अभाव के विषय में विचार व्यक्त करने वाले पहले विद्वान थे।
महात्मा गांधी के विचार में व्यक्तिगत मितव्ययता, सामाजिक धन की न्यासधारिता और अहिंसा एक व्यक्ति और एक राष्ट्र के जीवन में उच्चतर लक्ष्य प्राप्त करने की कुंजी है। उनके विचार क्लब ऑफ रोम की रिपोर्ट लिमिट्स टू ग्रोथ (1972), शूमाकर की पुस्तक स्मॉल इज ब्यूटीफुल (1974), ब्रुडलैंड कमीशन की रिपोर्ट ऑवर कॉमन फ्यूचर (1987) और एजेंडा- 21 रिपोर्ट ऑफ द रियो कॉन्फ्रेंस (1993) में भी प्रतिध्वनित हुए हैं।

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