सार ▪ कक्षा 10 ▪ अध्याय 2

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 वन एवं वन्य जीव संसाधन अध्याय का सार

भारत, जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहां विश्व की सारी जैव उपजातियों की 8% संख्या (लगभग 16 लाख) पाई जाती है।

देश में वन आवरण के अंतर्गत कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 24.16% हिस्सा है।

विभिन्न प्रकार के पौधे और प्राणियों की श्रेणियां-

1. सामान्य जातियां- वे जातियां जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है, जैसे पशु, साल, चीड़, कृन्तक (रोडेंट्स) इत्यादि।

2. संकटग्रस्त जातियां- वे जातियां जिनके लुप्त होने का खतरा है, जैसे- काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, गैंडा, शेर पूंछ वाला बंदर, संगाई (मणिपुरी हिरण) आदि

3. सुभेद्य (Vulnerable) जातियां- वे जातियां जिनकी संख्या घट रही है एवं यदि विपरीत परिस्थितियों के चलते इनकी संख्या ऐसे ही घटती रही तो यह संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगी। जैसे- नीली भीड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन आदि।

4. दुर्लभ जातियां- इन जातियों की संख्या बहुत कम या सुभेद्य है यदि विपरीत परिस्थितियों के चलते इनकी संख्या ऐसे ही घटती रही तो यह भी संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगी।

5. स्थानिक जातियां- प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं से अलग विशेष क्षेत्र में पाई जाने वाली जातियाँ अंडमानी टील, अंडमानी जंगली सूअर, निकोबारी कबूतर और अरुणाचल के मिथुन इन जातियों के उदाहरण हैं।

6. लुप्त जातियां- वे जातियां जो इनके रहने के आवासों में खोज करने पर अनुपस्थित पाई गई हैं, जैसे- एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख आदि

अधिकतर जनजातीय क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वोत्तर और मध्य भारत में स्थानांतरित (झूम) खेती अथवा स्लैश और बर्न खेती के चलते वनों की कटाई या निम्नीकरण हुआ है। स्थानांतरित खेती के अंतर्गत बड़े पैमाने पर जंगलों को काटकर खेत तैयार किये जाते हैं।

हिमालयन यव (चीड़ की प्रकार का सदाबहार वृक्ष) एक औषधीय पौधा है, जो हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्र में पाया जाता है। इसकी छाल, पत्तियों, टहनियों और जड़ों से टकसोल नामक रसायन निकाला जाता है, जिससे विश्व में सबसे अधिक बिकने वाली कैंसर औषधि बनाई जाती है।

भारत के आधे से अधिक प्राकृतिक वन लगभग खत्म हो चुके हैं, एक तिहाई जलमग्न भूमि (wetland) सूख चुकी है, 70% धरातलीय जल क्षेत्र प्रदूषित हैं, 40% मैंग्रोव क्षेत्र लुप्त हो चुका है।

भारतीय वन्य जीवन (रक्षण) अधिनियम 1972 में लागू किया गया था।

प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत बाघ संरक्षण हेतु 1973 में की गयी थी।

वन एवं वन्य जीव संसाधनों का वर्गीकरण

1. आरक्षित वन- ये वन सरकार के प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण में होते हैं। इन्हें सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है। देश में आधे से अधिक वन क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किए गए हैं।

2. रक्षित वन- ये वन सरकार की देख-रेख में रहते हैं लेकिन स्थानीय लोगों को ईंधन के लिए लकड़ी एकत्र करने एवं मवेशियों को चराने की अनुमति दी जाती है। देश के कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा रक्षित वन है।

3. अवर्गीकृत वन- अन्य सभी प्रकार के वन और बंजर भूमि जो सरकार, व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं, अवर्गीकृत वन कहे जाते हैं।

मध्यप्रदेश में स्थाई वनों के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र है, जो कि प्रदेश के कुल वन क्षेत्र का भी 75% है।


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