सार ● कक्षा 9 ●अध्याय 4
जलवायु अध्याय का सार
● एक विशेष समय में किसी क्षेत्र के वायुमंडल की
अवस्था को मौसम कहते हैं।
● मानसून शब्द की व्युत्पत्ति अरबी शब्द मौसम से हुई है, जिसका
शाब्दिक अर्थ है मौसम। एक वर्ष के दौरान
वायु की दिशा में ऋतु के अनुसार परिवर्तन को ही मानसून कहते हैं। भारत की जलवायु
मानसूनी प्रकार की है।
● देश के अधिकतर भागों में जून से सितंबर तक वर्षा होती है लेकिन कुछ
क्षेत्रों जैसे तमिलनाडु तट पर अधिकतर वर्षा अक्टूबर एवं नवंबर में होती है।
● उत्तरी मैदान में वर्षा की मात्रा सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर
घटती जाती है।
● अक्षांश, ऊंचाई, वायुदाब, पवन तंत्र, समुद्र से दूरी, महासागरीय
धाराएं तथा उच्चावच लक्षण किसी भी क्षेत्र की जलवायु को नियंत्रित करने वाले
प्रमुख कारक हैं।
● कर्कवृत्त के दक्षिण में स्थित क्षेत्र को उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र
एवं उत्तर में स्थित क्षेत्र को उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र कहा जाता है।
● भारत, उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनों वाले क्षेत्र में स्थित है। ये
पवनें उत्तरी गोलार्द्ध की उपोष्ण कटिबंधीय उच्चतर पवनों से उत्पन्न होती हैं।
कोरिआलिस बल-
पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न आभासी बल को कोरिआलिस बल कहते हैं। इस बल के
कारण पवनें उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं और
विक्षेपित हो जाती हैं। इसे फेरेल का नियम भी कहते हैं।
जेट धारा- यह
एक संकरी पट्टी में स्थित क्षोभमंडल में अत्यधिक ऊंचाई (12000 मीटर
से अधिक) वाली पश्चिमी
हवाएं होती हैं। इनकी गति गर्मी में 110 किलोमीटर प्रतिघंटा एवं सर्दी में 184
किलोमीटर
प्रति घंटा होती है।
अंतः
उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र- यह विषुवतीय अक्षांश में विस्तृत
गर्त एवं निम्न दाब का क्षेत्र होता है। यहीं पर उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी
व्यापारिक पवने आपस में मिलती हैं। यह अभिसरण क्षेत्र विषुवत वृत के लगभग समानांतर
होता है, लेकिन सूर्य की आभासी गति के साथ-साथ यह उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकता है।
● वर्षा ऋतु में उत्तर-पश्चिमी
भारत तथा पाकिस्तान में निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है, जिसे मानसून गर्त कहते
हैं। इसी समय उत्तरी अंतः उष्ण अभिसरण (NITC) उत्तर की ओर
खिसकने लगती है। जिसके कारण विषुवत रेखीय पछुआ पवन एवं दक्षिणी गोलार्ध की दक्षिण
पूर्वी वाणिज्यिक पवन विषुवत रेखा को पार करके फेरेल नियमों का अनुसरण करते हुए
भारत में प्रवाहित होने लगती हैं, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून के नाम से जाना जाता
है। भारत की अधिकांश वर्षा (लगभग 80%) इसी मानसून से
होती है।
● एल नीनो दक्षिणी दोलन से जुड़ी एक गर्म समुद्री जलधारा है, जो पेरू की
ठंडी धारा के स्थान पर प्रत्येक 2 या 5 वर्ष के अंतराल
में पेरू तट से होकर बहती है।
● मानसून का समय जून के आरंभ से लेकर मध्य सितंबर तक, 100 से 120
दिनों
के बीच होता है।
● भारत की प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण दक्षिण-पश्चिम का मानसून दो
शाखाओं में विभाजित हो जाता है।
1. अरब सागर की शाखा 2. बंगाल की खाड़ी
की शाखा
● अरब सागर शाखा का मानसून सबसे पहले भारत के केरल राज्य में जून के
प्रथम सप्ताह में आता है। यहां यह पश्चिमी घाट पर्वत से टकराकर केरल के तटों पर
वर्षा करता है। इसे मानसून प्रस्फोट कहा जाता है।
● गारो, खासी एवं जयंतिया पहाड़ियों पर बंगाल की खाड़ी से आने वाली
हवाएं (दक्षिण पश्चिमी मानसून की शाखा) अधिक वर्षा लाती है, जिसके कारण यहां स्थित
मॉसिनराम (मेघालय) विश्व का सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला स्थान है(लगभग 1141
सेंटीमीटर)।
यह स्टेलैग्माइट एवं स्टैलेक्टाइट गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है।
● मानसूनी पवनों द्वारा समय-समय पर अपनी दिशा पूर्णतया बदल लेने के
कारण भारत में निम्न चार ऋतु पाई जाती हैं-
1.
शीत ऋतु- 15 दिसंबर से 15
मार्च
2. ग्रीष्म ऋतु- 16 मार्च से 15 जून
3. वर्षा ऋतु- 16 जून से 15 सितंबर
4. शरद ऋतु- 16 सितंबर से 14 दिसंबर
● शरद ऋतु को मानसून प्रत्यावर्तन का काल कहा जाता है। इस ऋतु में बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। इन चक्रवातों से पूर्वी तटीय क्षेत्रों में मुख्यतः आंध्र प्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिम तटीय क्षेत्रों (गुजरात, महाराष्ट्र) में काफी क्षति पहुंचती है।

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